गणेश जी दस दिन के लिए पृथ्वी पर आते है !

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17,000 नारियल से बनी इको फ्रेंडली गणेश प्रतिमा

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

हर वर्ष गणेश चतुर्थी से लेकर अनंत चतुर्दशी तक गणेश उत्सव मनाया जाता है। पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक, गणेश चतुर्थी के दिन प्रथम पूज्य गजानन का जन्म हुआ था। लोक मान्यता यह भी है कि दस दिन के लिए भगवान गणेश पृथ्वी पर आते हैं। गणेश पूजन की परंपरा का इतिहास केवल आस्था से ही नहीं, आजादी के आंदोलन से भी जुड़ा है।

देश की स्वाधीनता की जंग के समय स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक बाल गंगाधर तिलक ने समाज में समरसता बढ़ाने के लिए गणेश उत्सव को सार्वजनिक रूप से मनाने की यह रीत शुरू की थी, ताकि आम लोगों की इस उत्सव के साथ ही स्वतंत्रता आंदोलन में भी भागीदारी हो सके।

वर्ष 1893 में बाल गंगाधर तिलक ने इस पारिवारिक उत्सव को पूरी तरह से सार्वजनिक आयोजन में परिवर्तित करने का कार्य किया था। उनका यह कदम से बहुत से सामाजिक सुधार और सकारात्मक सोच को विस्तार देने वाला भी रहा। कभी परिवार तक सीमित रही गणपति पूजा को सार्वजनिक महोत्सव के रूप में स्वीकार्यता दिलाने से यह पर्व न केवल धार्मिक कर्मकांड से दूर हुआ, बल्कि राष्ट्रीय एकता, छुआछूत से मुक्ति, संगठित-सजग समाज के निर्माण और आमजन को देश में बन रहे हालातों के प्रति जागरूक करने का आयोजन बन गया। आजादी के आंदोलन को भी गति मिली। तभी से यह उत्सव समाज को जोडने वाली एक कड़ी बना हुआ है।

दरअसल पारिवारिक रीति-नीति से निकलकर किसी उत्सव का लोक पर्व बन जाना, समाज को बांधने और साधने का अनुष्ठान बन ही जाता है। यही वजह है कि भारत की सांस्कृतिक पहचान को कायम रखने में गणेशोत्सव जैसे पर्वों की अहम भूमिका रही है। हमारी सांस्कृतिक विविधता और पर्व-त्योहार पूरी दुनिया देश को अनूठी पहचान देने वाले हैं। यूनेस्को भी भारत के इन पर्वों और मेलों को अमूर्त धरोहर की संवर्ग सूची में शामिल करता रहा है।

गौरतलब है कि यूनेस्को ने 2008 से भारत की अमूर्त सांस्कृतिक विरासतों को वैश्विक संरक्षण देने के लिए अपनी इंटैंजिबल लिस्ट में सूचीबद्ध करने की शुरुआत की थी। अब तक हमारे 14 त्योहारों, मेलों, क्षेत्रीय नृत्यों और परंपराओं को इस सूची में जोड़ा जा चुका है। गणेशोत्सव के समान ही उत्साह भरने वाले दुर्गा पूजा के नौ दिन चलने वाले उत्सव के साथ ही रामलीला, राजस्थान की कालबेलिया नृत्य संगीत परंपरा, कुंभ मेला, गढ़वाली पर्व रम्मन, छऊ नृत्य और वैदिक मंत्रोच्चारण की परंपरा को यूनेस्को भारत की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहरों में शामिल कर चुका है। वैश्विक स्तर पर इनकी चर्चा और संरक्षण की बात वाकई रेखांकित करने योग्य है।

17,000 नारियल से बनी इको फ्रेंडली गणेश प्रतिमा

गणेश चतुर्थी उत्सव पर हैदराबाद में लोगों के लिए भगवान गणेश की मूर्ति आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। भगवान गणेश की ये मूर्ति 17,000 नारियल का उपयोग करके बनाई गई है।

एएनआइ से बात करते हुए हैदराबाद शहर में एक आयोजक कुमार ने कहा, गणेश पंडाल को विभिन्न विषयों के साथ उत्कृष्ट रूप से सजाया गया है। केरल के एक कलाकार हैदराबाद से यहां पहुंचे थे जिन्होंने नारियल से बने गणेश पंडाल को सजाया है।

कुमार ने कहा, नारियल से बने गणेश वास्तव में हैदराबाद के लोगों को आकर्षित कर रहे हैं। लोगों को मेरा सुझाव है कि लोग पीओपी मूर्तियों को खरीदने से बचें। हमारे आस-पास एक सुरक्षित वातावरण बनाने के लिए हम सभी के लिए पर्यावरण के अनुकूल मूर्तियों की खरीद का पालन करना जरूरी है।

उन्होंने कहा, लोगों के बीच नारियल को लेकर अलग-अलग भावनाएं जुड़ी हुई हैं। नारियल का प्रयोग कई अवसरों पर किया जाता है। उसी के चलते हमने नारियल से भगवान गणेश की मूर्ति बनाई है। इस मूर्ति को बनाने में हमने 17,000 नारियल का उपयोग किया है और इसे पूरा करने में 8 दिन लगे।

लोअर टैंक बंड सराय हैदराबाद के निवासी अनूप ने कहा कि हर साल, हमारा शहर पर्यावरण के अनुकूल गणेश मूर्ति को बनाने के लिए बढ़ावा देता है और दूर दूर के स्थानों से पर्यटक मूर्ति को देखने के लिए यहां आते हैं और लोगों की भारी भीड़ इकट्ठा होती है।

न्होंने कहा, हर साल हमारे मोहल्ले के मुरली अन्ना गणेश पंडाल लगाते हैं। वह कुछ समय से यहां मूर्ति का प्रदर्शन कर रहे हैं। हमने इस साल नारियल पर आधारित एक गणेश जी की मूर्ति को बनाया है जो पर्यावरण के अनुकूल है। हम हमेशा से यहां पर्यावरण के अनुकूल ही गणेश की मूर्ति रखते हैं। इसे देखने के लिए शहर के विभिन्न क्षेत्रों से बड़ी संख्या में सैलानी यहां आते हैं।

 

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