बहुला चतुर्थी व्रत का पूजन कन्याओं ने आस्था और निष्ठा से किया

बहुला चतुर्थी व्रत का पूजन कन्याओं ने आस्था और निष्ठा से किया

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श्रीनारद मीडिया,उतम पाठक, दारौंदा, सीवान (बिहार):

सिवान जिला के दरौदा प्रखंड  सहित सभी प्रखंडों  के विभिन्न गांवों में बहुला चतुर्थी व्रत का पूजन कन्याओं ने आस्था और निष्ठा से किया। बहुला व्रत भाद्रपद महिने के कृष्ण पक्ष की संकष्टी चतुर्थी तिथि के दिन मनाई जाती है। इस कथा की पौराणिक मान्यता के अनुसार इस दिन व्रती दिनभर उपवास रहकर शाम को स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण कर और स्वच्छ मिटी से शिव पार्वती, श्री गणेश और बहुला गाय की प्रतिमा बनाकर मंत्रोच्चारण के साथ विधि विधान से पूजन अर्चन करती हैं।

साथ ही मनोवांछित फल की कामना करती हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन जो मनुष्य गाय बछड़े की पूजा करता है उसे सभी तरह के ऐश्वर्य तथा संतान सुख की प्राप्ति होती हैं। प्राचीन काल की एक बहुत ही प्रसिद्ध रोचक तथा प्रचलित कथा है । बहुला चतुर्थी व्रत कथा में गाय और सिंह की कथा बहुत ही रोचक है। बहुला नाम की एक गाय थी। जो चरते चरते बीच जंगल में चली गई । सामने खड़े सिंह को देखकर बहुला भयभीत हो गई। सिंह कहता है कि मै कई दिनों से भूखा हूं।

आज मैं तुम्हें खाकर अपनी भूख मिटाऊंगा। बहुला कहती हैं कि हे “वन के राजा”मेरा बछड़ा भूखा है। बछड़े को दूध पिलाकर मैं आपका आहार बनने वापस आ जाऊंगी। बहुला ने सत्य और धर्म की शपथ लेकर कहा कि मैं वापस आऊंगी,मैं वचन देती हूं।

बहुला अपने बछड़े को दूध पिलाकर वापस वन में आ गई । और कहती है मुझे खाकर अपनी भूख मिटालो। बहुला की सत्यनिष्ठा को देखकर सिंह प्रभावित हो कर अपने वास्तविक स्वरूप श्री कृष्ण के रूप में आकर कहा कि – हे बहुला अब से भाद्रपद कृष्ण चतुर्थी के दिन गौ माता के रूप में तुम्हारी पूजा होगी। इस दिन जो तुम्हारी पूजा करेंगे, उन्हें धन और संतान की प्राप्ति होगी।


आज ही के दिन महिलाएं सर्व संकट हारिणी पार्वती नंदन भगवान श्री गणेश जी के एकदंत स्वरूप का श्रद्धा पूर्वक कहे हुए अनुसार संकष्टी श्री गणेश की विधि पूर्वक अक्षत, चंदन, पुष्प, फल, मिठाई इत्यादि सामग्रियों से पूजन करती हैं और राजा नल और दमयंती की कथा सुनती है और कथा पश्चात आरती कर उदित चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत संपन्न करती है। सभी विघ्न को नाश करने वाला और सुख देने वाला यह एक सर्वोत्तम व्रत है।

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