नये वर्ष 2082 का राजा मंत्री है सूर्य, इस वर्ष होगी अल्प वर्षा ,अन्न तथा फल के उत्पादन में आएगी कमी
श्रीनारद मीडिया, सेंट्रल डेस्क:
विक्रम संवत 2082 का नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (दिनांक ३० मार्च सन् २०२५ ई.) दिन रविवार को प्रारम्भ हो रहा है। वर्षारम्भ में सिद्धार्थ नामक संवत्सर है, जो संकल्प आदि के लिए वर्षभर प्रयोग किया जायेगा। फाल्गुन शुक्ल ७ मंगलवार दिनांक २४ फरवरी २०२६ ई. को इष्ट ९।५३ (दि.१०।१६) से रौद्र नामक संवत्सर का प्रवेश होगा।
५३वाँ सिद्धार्थ संवत्सर का फल-तोयपूर्णो भवेन्मेघो बाहुसस्या वसुन्धरा।
सुखिनः पार्थिवाः सर्वे सिद्धार्थे शृणु सुन्दरी।। सिद्धार्थं वत्सरे भूयो ज्ञानवैराग्ययुक् प्रजा ।। सकला वसुधा भाति बहुसस्यार्घ वृष्टिभिः ।।
सिद्धार्थ संवत्सर में प्रजा ज्ञान वैराग्य से युक्त होगी। सम्पूर्ण पृथ्वी पर प्रसन्नता रहेगी। अच्छी वर्षा होने से कृषि कार्य में लाभ होगा। राजा व प्रजा दोनों सुखी रहेंगे।
५४वाँ रौद्र संवत्सर का फल- अल्पतोयप्रदा मेघा अल्पसस्या च मेदिनी। निष्ठुराः पार्थिवाः रौद्रे दवाग्निः प्रजायते ।। रौद्रेब्दे नृपसंभूतक्षोभ -क्लेशसमन्विते। सततत्वखिला लोका मध्यसस्यार्घ वृष्टय ॥ रौद्र संवत्सर में प्रजा व राजा क्लेश युक्त रहेंगे। वर्षा अल्प होने से पृथ्वी पर अन्न के उत्पादन कम होंगे। राजा लोग निष्ठुर होंगे तथा अनेक स्थान पर अग्नि का भय रहेगा।
राजा सूर्य फल-सूर्ये नृपे स्वल्प जलाश्च मेघाः स्वल्पं धान्यमल्प-फलाश्च वृक्षाः। स्वल्पं पयो गोषु जनेषु पीडा चौराग्नि बाधा निधनं नृपाणाम् ।। सूर्य के राजा होने से अल्प वर्षा होगी। अन्न तथा फल के उत्पादन कम होंगे। गायें कम दूध देने वाली, प्रजा को कष्ट व पीड़ा होगी। चोर व अग्नि का भय रहेगा। किसी बड़े नेता का निधन सम्भव है।
मन्त्री सूर्य फल-नृपभयं गदतोऽपि हि तस्करात्प्रचुर धान्य धनानि महीतले। रसचयं हि समर्घतमं तदा रविरमात्यपदं हि समागतेः ॥ इस वर्ष मन्त्री का पद सूर्य को प्राप्त है। प्रजा व राजाओं में रोग तथा चोर भय रहेगा। किन्तु पृथ्वी पर प्रचुर अन्न का उत्पादन तथा रस पदार्थ सस्ते होंगे।
सस्येश बुध फल-जलधारा जलराशि मुचो भृशं सुख समृद्धि युतं निरुपद्रवम्। द्विजगणः स्तुति-पाठकरः सदा प्रथम सस्यपतौ सति बोधने ।। बुध को सस्येश का पद प्राप्त है। वर्षा अधिक होगी। जनता सुख समृद्धि से युक्त होगी तथा देश उपद्रव रहित होगा। विप्रगण शान्ति पूर्वक अपने कर्म में तत्पर रहेंगे।
दुर्गेश सूर्य फल-नयविशेष-करस्तरणिस्तदा गतभया नरराज-पुरोगमाः। समधिकेन तदा नृपतोन्यः पथिषु संव्रजता न भयं क्वचित् ॥ दुर्गेश का पद सूर्य को प्राप्त है। अतः शासक गण नीति सम्पन्न व्यवहार करेंगे।
साथ ही राजा व प्रजा निर्भय रहेंगे। शासक के सुव्यवस्था के कारण पथिकों को कोई भय नहीं रहेगा।
धनेश बुध फल- द्रविणपो हिमरश्मिसुतो यदा विविध-संग्रह-वस्तु-फला तदा। द्विजवरा जपयज्ञसु संयुताः कृषि-विशेषविशेषित मानसाः ।। इस वर्ष धनेश का पद बुध को प्राप्त है। अनेक वस्तु संग्रह करें। आगे लाभ प्राप्त होंगे। विप्रवर्ग जप यज्ञ में तल्लीन होंगे। साथ ही कृषक कृषि कार्य में विशेष ध्यान देंगे।
रसेश शुक्र फल- भृगुसुते रसनायकता गते जनपदा जलतोषित मानसाः। सुख-सुभिक्ष-प्रमोदवती धरा धरणिपा नरपालनतत्पराः ।। रसेश का पद शुक्र को प्राप्त होने से उत्तम वृष्टि से जनता प्रसन्न होगी। साथ ही सुख-समृद्धि सम्पन्न होंगे। शासक वर्ग जनता के सेवा में तत्पर रहेंगे।
धान्येश भौम फल-गोधूमसर्षपा मुद्गतिलभाष-प्रवालकाः। महर्घ
जायते घोरं भौमे धान्याधिपे सति ।। धान्येश का पद भौम को प्राप्त होने से गेहूँ, सरसों, मूँग, तिल, उदड़ तथा मूँग के प्रभाव में तेजी रहेगी।
नीरसेश बुध फल-चित्रं वस्त्रादिकं चैव शंख-चन्दन-पूर्वकम्।
अर्घवृद्धिः प्रजायेत नीरसेशो बुधो यदि ।। नीरसेश पद बुध को प्राप्त होने से चित्र, वस्त्र, शंख तथा चन्दन के भाव में वृद्धि होगी। अन्य वस्तुएँ सस्ते होंगे।
फलेश शनि फल-यदि शनिः फलपः कलहो भवेज्जनित पुष्प गणास्तरवः सदा।। द्विजभयं नरतस्करजं तदा जनपदा जनराशिसमाकुलाः ।।
शनि फलेश होने से फल-पुष्प तथा वृक्षों के लिए लड़ाई-झगड़े होंगे। चोरों – द्वारा द्विजाति को कष्ट होंगा। जनपदों के जन समूह व्याकुल रहेंगे।
मेघेश सूर्य फल-रवौ मेघाधिपे जाते स्वल्पतोय प्रदा घनाः।
स्वल्प-धान्यं भवेल्लोके भयं च भूतले सदा ।। मेघेश का पद सूर्य को प्राप्त होने से बादल अल्प वर्षा करेंगे। साथ ही अल्प अन्न का उत्पादन होने से संसार में भय व्याप्त रहेगा।
हमारा नववर्ष चैत्र प्रतिपदा से आरंभ होता है।
1. चैत्र
2. वैशाख
3. ज्येष्ठ
4. आषाढ़
5. श्रावण
6. भाद्रपद
7. अश्विन
8. कार्तिक
9. मार्गशीर्ष
10. पौष
11. माघ
12. फाल्गुन
चैत्र मास ही हमारा प्रथम मास होता है, चैत्र मास के शुक्ल पक्ष को नववर्ष मानते हैं। चैत्र मास अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार मार्च-अप्रैल में आता है, चैत्र के बाद वैशाख मास आता है जो अप्रैल-मई के मध्य में आता है, ऐसे ही बाकी महीने आते हैं। फाल्गुन मास हमारा अंतिम मास है जो फरवरी-मार्च में आता है। फाल्गुन की अंतिम तिथि से वर्ष की समाप्ती हो जाती है, फिर अगला वर्ष चैत्र मास का पुन: तिथियों का आरम्भ होता है जिससे नववर्ष आरम्भ होता है।
हमारे समस्त वैदिक मास ( महीने ) का नाम 28 में से 12 नक्षत्रों के नामों पर रखे गये हैं।
जिस मास की पूर्णिमा को चन्द्रमा जिस नक्षत्र पर होता है उसी नक्षत्र के नाम पर उस मास का नाम हुआ।
1. चित्रा नक्षत्र से चैत्र मास
2. विशाखा नक्षत्र से वैशाख मास
3. ज्येष्ठा नक्षत्र से ज्येष्ठ मास
4. पूर्वाषाढा या उत्तराषाढा से आषाढ़
5. श्रावण नक्षत्र से श्रावण मास
6. पूर्वाभाद्रपद या उत्तराभाद्रपद से भाद्रपद
7. अश्विनी नक्षत्र से अश्विन मास
8. कृत्तिका नक्षत्र से कार्तिक मास
9. मृगशिरा नक्षत्र से मार्गशीर्ष मास
10. पुष्य नक्षत्र से पौष मास
11. माघा मास से माघ मास
12. पूर्वाफाल्गुनी या उत्तराफाल्गुनी से फाल्गुन मास
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