जनसुराज साथियों ने छठ व्रतियों से मिल माँगा अर्शीर्वाद.
छठ वनस्पति विज्ञान का भी पर्व
11 अप्रैल को बिहार बदलाव रैली मेँ भागीदारी का निवेदन.
श्रीनारद मीडिया, सीवान (बिहार):
सीवान जिला के जीरादेई प्रखंड क्षेत्र मेँ जनसुराज साथियों ने गुरुवार को छठव्रतियों से मिलकर बिहार की विकास एवं खुशहाली के लिए आशीर्वाद माँगा तथा 11 अप्रैल 2025 को पटना गाँधी मैदान मेँ बिहार बदलाव रैली मेँ शरिक होने के लिए निमंत्रण दिया गया.जिला मुख्य प्रवक्ता डा कृष्ण कुमार सिंह ने बताया कि चैत एवं
कार्तिक मास पूरा ही प्रकृति में वनस्पति, औषध, कृषि और उसके उत्पाद के ज्ञान की धारा लिए है।
डा सिंह ने बताया कि पुराणों में षष्ठी माता का परिचय: इस प्रकार है.
श्वेताश्वतरोपनिषद् में बताया गया है कि परमात्मा ने सृष्टि रचने के लिए स्वयं को दो भागों में बांटा. दाहिने भाग से पुरुष, बाएं भाग से प्रकृति का रूप सामने आया.
ब्रह्मवैवर्तपुराण के प्रकृतिखंड में बताया गया है कि सृष्टि की अधिष्ठात्री प्रकृति देवी के एक प्रमुख अंश को देवसेना कहा गया है. प्रकृति का छठा अंश होने के कारण इन देवी का एक प्रचलित नाम षष्ठी है. उन्होंने बताया कि
पुराण के अनुसार, ये देवी सभी बालकों की रक्षा करती हैं और उन्हें लंबी आयु देती हैं.
”षष्ठांशा प्रकृतेर्या च सा च षष्ठी प्रकीर्तिता |
बालकाधिष्ठातृदेवी विष्णुमाया च बालदा ||
आयु:प्रदा च बालानां धात्री रक्षणकारिणी |
सततं शिशुपार्श्वस्था योगेन सिद्धियोगिनी” ||
(ब्रह्मवैवर्तपुराण/प्रकृतिखंड)
षष्ठी देवी को ही स्थानीय बोली में छठ मैया कहा गया है. षष्ठी देवी को ब्रह्मा की मानसपुत्री भी कहा गया है, जो नि:संतानों को संतान देती हैं और सभी बालकों की रक्षा करती हैं. आज भी देश के बड़े भाग में बच्चों के जन्म के छठे दिन षष्ठी पूजा या छठी पूजा का चलन है. उन्होंने बताया कि
पुराणों में इन देवी का एक नाम कात्यायनी भी है. इनकी पूजा नवरात्र में षष्ठी तिथि को होती है.
डा सिंह ने बताया कि सूर्य का षष्ठी के दिन पूजन का अधिक महत्व है :
हमारे धर्मग्रथों में हर देवी-देवता की पूजा के लिए कुछ विशेष तिथियां बताई गई हैं. उदाहरण के लिए, गणेश की पूजा चतुर्थी को, विष्णु की पूजा एकादशी को किए जाने का विधान है. इसी तरह सूर्य की पूजा के साथ सप्तमी तिथि जुड़ी है. सूर्य सप्तमी, रथ सप्तमी जैसे शब्दों से यह स्पष्ट है. लेकिन छठ में सूर्य का षष्ठी के दिन पूजन अनोखी बात है.
सूर्यषष्ठी व्रत में ब्रह्म और शक्ति (प्रकृति और उनके अंश षष्ठी देवी), दोनों की पूजा साथ-साथ की जाती है. इसलिए व्रत करने वालों को दोनों की पूजा का फल मिलता है. यही बात इस पूजा को सबसे खास बनाती है.
उन्होंने बताया कि महिलाओं ने छठ के लोकगीतों में इस पौराणिक परंपरा को जीवित रखा है. दो लाइनें देखिए:
”अन-धन सोनवा लागी पूजी देवलघरवा हे,
पुत्र लागी करीं हम छठी के बरतिया हे ‘
दोनों की पूजा साथ-साथ किए जाने का उद्देश्य लोकगीतों से भी स्पष्ट है. इसमें व्रती कह रही हैं कि वे अन्न-धन, संपत्ति आदि के लिए सूर्य देवता की पूजा कर रही हैं. संतान के लिए ममतामयी छठी माता या षष्ठी पूजन कर रही हैं.
इस तरह सूर्य और षष्ठी देवी की साथ-साथ पूजा किए जाने की परंपरा और इसके पीछे का कारण साफ हो जाता है. पुराण के विवरण से इसकी प्रामाणिकता भी स्पष्ट है.
कुछ खास बातें हैं जैसे कि माता स्वयं प्रकृति का रूप हैं तो प्रकृति खुद को स्वस्थ एवं स्वच्छ देखना चाहती है, तो स्वच्छता का महत्व बहुत ही ज्यादा है । कहीं कहीं छठी माता को भगवान भास्कर की धर्मबहिन भी माना गया है जो पूर्णतः सत्य है ।
डा सिंह ने बताया कि
छठ महापर्व एक ऐसा त्योहार है जिसमे न किसी पंडित की जरूरत पड़ती है न किसी मन्त्र की । तीसरी चीज की भारतीय समाज जातिवादी है और छूत अछूत जैसी परम्परा है , तो इसका जवाब है कि पर्व की सबसे जरूरी सामग्री में से सूप और दौड़ा , समाज के सबसे निचले तबके से आने वाली डोम जाती के लोग ही बनाते हैं , फल सब्जी उगाने वाले ज्यादातर लोग पिछड़ी जातियों से ही आते है , बेचने वाले भी वैश्य या अन्य पिछड़े वर्गों के हीं लोग होते हैं , बाजा बजाने वाले भी आम तौर पे रविदास नाम के समाज से आते है जोकि अनुसूचित जाती के एक प्रमुख अंग हैं , इसी तरह कहार , कोइरी , कुर्मी , नाई(नाउन) आदि अन्य जातियों को भी रोजगार मिलता है , एवम हर समाज के लोगो का योगदान रहता है तथा हमारा अर्थव्यवस्था मजबूत होता है.
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