किसान आंदोलन को लेकर किसानों के आगे झुके थे राजीव गांधी.
श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क
पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की आज जयंती है। देश उनको याद कर रहा है। ऐसे समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए 3 नए कानूनों को वापस लेने का ऐलान किया है। इंदिरा गांधी और किसान आंदोलन को लेकर यह महज संयोग हो सकता है लेकिन इतिहास दोहराया गया। आज से 32 साल पहले 31 अक्टूबर 1988 को इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि पर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को किसानों के आगे झुकना होना पड़ा था। राजीव गांधी के किसानों के 35 मांगों पर फैसला लेने के आश्वासन देने के बाद वोट क्लब का धरना 31 अक्टूबर 1988 को खत्म हुआ।
32 साल पहले किसान आंदोलन के आगे झुकी थी सरकार
नए कृषि कानूनों को वापस लेने और फसल के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की गारंटी की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे किसान पीछे हटने को तैयार नहीं हैं. पंजाब और हरियाणा से आए हजारों किसान पिछले 4 दिन से दिल्ली बॉर्डर पर डटे हुए हैं. किसानों ने बुराड़ी जाने से मना कर दिया और वो दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करना चाहते हैं. किसान आंदोलन से दिल्ली की सियासी तपिश बढ़ती नजर आ रही है. ऐसे ही 32 साल पहले किसानों ने दिल्ली के बोट क्लब पर हल्ला बोल कर दिल्ली को ठप कर दिया था। किसानों ने एक बार फिर ठान लिया है कि जब तक सरकार कानून को वापस नहीं लेगी वे डिगेंगे नहीं।
बता दें कि करीब 32 साल पहले 25 अक्टूबर 1988 को किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में भारतीय किसान यूनियन के लोग अपनी मांगों को लेकर दिल्ली में बोट क्लब पर रैली करने वाली थे। किसान बिजली, सिंचाई की दरें घटाने और फसल के उचित मूल्य सहित 35 सूत्री मांगों को लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश से बड़ी संख्या में दिल्ली आ रहे थे, उनको दिल्ली के लोनी बॉर्डर पर पुलिस प्रशासन के द्वारा बल पूर्वक रोकने की कोशिश की गई। किसान नहीं रुके पुलिस ने लोनी बॉर्डर पर फायरिंग की और दो किसानों की जान चली गई। पुलिस की गोली लगने से कुटबी के राजेंद्र सिंह और टिटौली के भूप सिंह की मौत हो गई थी। इसके बावजूद किसान दिल्ली पहुंचे थे।
देश के 14 राज्यों के 5 लाख किसानों ने दिल्ली के वोट क्लब पर पहुंचकर दिल्ली को पूरी तरह से ठप कर दिया था। केंद्र सरकार के खासमखास विभागों की इमारतों के बीच हरे-भरे बोट क्लब पर किसानों का जमघट लग गया था, जिसकी वजह से पूरी दिल्ली ठप सी हो गई थी। इंडिया गेट, विजय चौक और बोट क्लब पर किसान ही किसान नजर आ रहे थे। किसानों ने अपनी बैल गाड़ियां और ट्रेक्टरों को बोट क्लब पर खड़ा कर दिया।
दिल्ली के बोट क्लब पर उन दिनों पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गांधी की पुण्य तिथि (31 अक्टूबर) के अवसर पर होने वाली रैली के लिए रंगाई-पुताई का काम चल रहा था। इस कार्यक्रम के लिए जो मंच बनाया गया था, उस पर भी किसानों ने कब्जा कर जमा लिया था। किसानों ने लुटियंस इलाके में जिस तरह से कब्जा जमाया था, उससे मंत्री से लेकर आधिकारी तक परेशान हो गए थे। महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में 12 सदस्यीय कमेटी ने राष्ट्रपति और लोकसभा अध्यक्ष बलराम जाखड़ से मुलाकात की, कोई निर्णय नहीं हो सका।
राजपथ से किसानों को हटाने के लिए पुलिस ने 30 अक्टूबर,1988 की रात में किसानों पर जिस तरह लाठी चार्ज कर दिया। सप्ताह भर से ज्यादा तक किसानों ने राजपथ को अपने कब्जे में रखा था। आखिरकार सरकार को किसानों के आगे नतमस्तक होना पड़ा। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के किसानों के 35 मांगों पर फैसला लेने के आश्वासन देने के बाद वोट क्लब का धरना 31 अक्टूबर 1988 को खत्म हुआ। हालांकि, किसान रैली के चलते राजीव गांधी को अपनी मां इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि की रैली का स्थान बदलना पड़ा। रैली को बोट क्लब के बजाय लालकिला के पीछे वाले मैदान में करनी पड़ी थी।
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