Lets Inspire Bihar अभियान के अंतर्गत युवा संवाद सुपौल में हुआ आयोजित.

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श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

LetsInspireBihar अभियान के अंतर्गत युवा संवाद हेतु16 अप्रैल, 2022 को सुपौल में उपस्थित था ! शुक्रवार को अपराह्न जब पाटलिपुत्र से सुपौल की ओर निकला तब माँ गंगा की पावन धाराओं को पार करते ही जैसे-जैसे बिहार के उत्तर की ओर बढ़ने लगा, #यात्रीमन प्राचीन #मिथिला की बौद्धिक परंपरा का स्मरण करने लगा और कहने लगा कि भारत में ज्ञान के महत्व को समझने हेतु ‘भा’ तथा ‘रत’ के अद्भुत संयोग से निर्मित अपने राष्ट्र “भारत” के आध्यात्मिक तात्पर्य पर चिंतन करना होगा चूंकि संस्कृत में ‘भा’ ज्ञान अथवा प्रकाश का द्योतक है तथा ‘रत’ का संबंध उसमें लीन होने से है ।

मन उस प्राचीनतम काल का स्मरण करने लगा जब ज्ञान के प्रकाश ने सर्वप्रथम भारत के पश्चिमी सप्त सिंधु क्षेत्र में मुख्यतः विलुप्त सरस्वती नदी की तटों पर वैदिक साहित्य के रूप में वट वृक्ष को उदीयमान किया था जिसे ज्ञान का भंडार माना गया । तत्पश्चात ज्ञान का विस्तार होने लगा और संपूर्ण वैदिक ज्ञान का उत्कर्ष यदि कहीं हुआ तो मिथिला की भूमि में ही हुआ जहाँ आज भी यात्रा करने पर ध्यान उन प्राचीन तत्वदर्शी विद्वानों की ओर आकर्षित हो जाता है जिनके विचारों ने वेदों के अंत रूपी “वेदांत” की रचना की जो आज भी मानवीय दर्शन की उत्कृष्ट प्रस्तुति है ।

मिथिला की प्राचीन बौद्धिक परंपरा का स्मरण करने पर अनेक विद्वानों एवं विदुषियों का स्मरण आने लगा जिसमें सर्वप्रथम महर्षि अष्टावक्र का स्मरण इसलिए आने लगा चूंकि एक बालक के दृढ़संकल्प में कितना सामर्थ्य हो सकता है, उन्होंने साक्षात रूप में सिद्ध किया । अष्टावक्र के बाल्यावस्था में ही असीम समस्याओं से सीधा साक्षात्कार तब प्रारंभ हुआ जब उनके पिता ऋषि कहोड़ मिथिला की ज्ञान सभा में आचार्य बंदिन या बंदी नामक विद्वान से पराजित हो गए । तत्कालीन मिथिला में अति ज्ञानी परंतु ज्ञान के कारण अहंकार को ग्रहण कर चुके आचार्य बंदिन के द्वारा पराजित होने पर जल समाधि की शर्त रहती थी ।

कहोड़ को अपनी विद्वता पर भरोसा था । अपनी दरिद्रता से परिपूर्ण आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करने हेतु उन्होंने आचार्य बंदिन के साथ शास्त्रार्थ प्रारंभ कर दिया परंतु पराजित होकर मर्त्यावस्था को प्राप्त हो गए । बाल अष्टावक्र के लिए यह दुर्घटना आकस्मिक विपत्ति के रूप में प्रस्तुत हुई । उनके शरीर में आठ वक्र थे जिसके कारण देखने में अजीब लगते थे और आमजनों के लिए उपहास के पात्र बन चुके थे । परंतु पितृशोक के दुराघात से भी बाल मन विचलित न होकर ज्ञान प्राप्त करने हेतु संकल्पित हो उठा ताकि अहंकारी बंदिन को पराजित कर पिता की पराजय का प्रतिशोध लिया जा सके ।

शनैः शनैः दृढ़ निश्चय आकृति रूप लेने लगा और कुछ समय के पश्चात अष्टावक्र अपने साथी श्वेतकेतु के साथ आचार्य बंदिन के साथ शास्त्रार्थ का विचार लिए मिथिला में राजा जनक की ज्ञान सभा में पहुँच गए । वहां द्वारपालों ने पहले तो उन्हें बहुत समझाने का प्रयास किया कि वे गलत स्थान पर पहुंच गए थे परंतु जब उन्होंने उनकी प्रकट इच्छा को जाना तब उपहास करने लगे और बालकों को वापस लौटने हेतु हतोत्साहित करने लगे । वे उपहास उड़ा रहे थे कि कैसे अष्टावक्र जैसे मूर्ख प्रतीत हो रहे बालक आचार्य बंदिन के साथ शास्त्रार्थ की बात कर रहे थे ।

तब कोलाहल होता देख जनक ने उन्हें राजप्रासाद में आमंत्रित किया तथा प्रारंभिक वार्ता के पश्चात ही शास्त्रार्थ की अनुमति दे दी । इस घटना ने तब इतिहास रच दिया जब लंबे शास्त्रार्थ के पश्चात बाल अष्टावक्र ने अंततः बंदिन को पराजित कर ही दिया । विजय के पश्चात हमारा साक्षात्कार बाल अष्टावक्र के महान स्वरूप से होता है चूंकि यदि वह चाहते हो शर्तों के अनुसार बंदिन को जल समाधि हेतु बाध्य कर सकते थे परंतु उन्होंने प्रतिद्वंदी को क्षमा कर दिया और जल समाधि की परंपरा का अंत कर दिया ।

अष्टावक्र के ज्ञान की चर्चा तब सर्वत्र दावानल की भांति विस्तृत होने लगी । उनके अपने कुल के अग्रजों यथा तात, पितामह इत्यादि ने भी उनसे ज्ञान ग्रहण करने की इच्छा व्यक्त की तथा उनके समक्ष इस हेतु प्रस्तुत हुए । फिर अचानक जब अष्टावक्र ने अपना संबोधन सभी एकत्रित जनों को “भो पुत्रकाः !” कह कर प्रारंभ किया तब उम्र में बड़े परिजनों को यह स्वीकार नहीं हुआ और उन्होंने तत्कालीन सम्मानित विद्वानों के समक्ष इस व्यवहार की तीव्र भर्त्सना की ।

परंतु तात्कालिक विद्वानों द्वारा जब समीक्षा की गई तब उन्होंने अष्टावक्र के व्यवहार को सही बताया तथा प्रतिपादित किया कि केवल उम्र में वरिष्ठ होने से कोई बड़ा नहीं होता अपितु वास्तविक ज्ञान के स्तर से ही कोई बड़ा हो सकता है । ऐसे में जब ज्ञान ग्रहण करने की इच्छा लिए वरीय कुटुंबी भी जब अष्टावक्र के समक्ष उपस्थित हुए तब उन्हें उपस्थित समूह के अन्य विद्यार्थियों के साथ पुत्र रूप में किया गया संबोधन त्रुटिपूर्ण नहीं था । इस प्रकरण से निश्चित रूप से स्पष्ट होता है कि बिहार में ज्ञान के सम्मान की परंपरा अत्यंत प्राचीन है ।

उपनिषद में युवा विचारकों का स्मरण करने पर महर्षि याज्ञवल्क्य का स्मरण आने लगा जिनके असीम ज्ञान रूपी वट वृक्ष से साक्षात्कार बृहदारण्यक उपनिषद में होता है तथा जिनके स्मरण से मिथिला के उस प्राचीन ज्ञान सभा की स्मृतियां भी नवीन हो उठती हैं जिसमें संपूर्ण भारत के विद्वानों को आमंत्रित किया गया था और जिसमें सबसे बड़े ज्ञानी सिद्ध होने पर दिए जाने वाले पारितोषिक में ऐसी सहस्त्र गौएं सम्मिलित थीं जिन सभी के सींगों पर स्वर्ण मढ़ा था । उस सभा के प्रारंभ होते ही विजेता हेतु नियत पुरस्कार की घोषणा के साथ प्रश्न किया गया कि वैसा कौन व्यक्ति सभा में उपस्थित था जो स्वयं को सबसे बड़ा विद्वान मानता था ।

प्रश्न तथा अन्य विद्वानों की उपस्थिति को देखकर जब किसी में भी स्वयं को सर्वश्रेष्ठ घोषित करने की हिम्मत नहीं हो रही थी और सभा में सर्वथा शांति समाहित हो गई थी, तब अचानक युवा याज्ञवल्क्य ने खड़े होकर अपने शिष्य सौम्यश्रवा को गौवों को हांक कर ले जाने का आदेश दिया गया । इसके पश्चात तो शांति पूर्णतः भंग हो गई और सभी विद्वान युवा को शास्त्रार्थ हेतु ललकारने लगे ।

तब याज्ञवल्क्य ने कहा कि वह नहीं जानते थे कि सबसे बड़ा विद्वान कौन था परंतु उन्हें तो मात्र पारितोषिक रूपक गौवों की आवश्यकता थी जिसके कारण उन्होंने अपने शिष्य को आदेशित किया था और यदि किसी अन्य को इसमें कोई संशय था तो निश्चित ही उन्हें शास्त्रार्थ में पराजित कर सकते थे । फिर क्या था, संपूर्ण श्रृंखला गतिमान हो उठी और एक के पश्चात अनेक विद्वान पराजित होते गए जिसमें महिला विदुषी गार्गी वाचक्नवी भी सम्मिलित थीं जिनके ज्ञान से तत्कालीन विदुषियों के सामर्थ्य का दर्शन मिलता है । अंततः याज्ञवल्क्य सर्वश्रेष्ठ सिद्ध हुए । इसी चिंतन के क्रम में जब सुपौल पहुंचा, तब मन अत्यंत आशान्वित था ।

सुपौल में कार्यक्रम स्थल (मिलन मैरेज हाॅल) पहुंचकर संवाद के क्रम में मैंने सर्वप्रथम #हिमालय के कणों को समाहित किए #कौशिकी की धाराओं से आच्छादित सुपौल की भूमि को नमन करते हुए मिथिला की प्राचीन बौद्धिक विरासत को ही उद्धृत किया और बताया कि क्षेत्र प्राचीन काल से ही मानव चिंतन के उत्कर्ष का प्रतीक रहा है और उस परंपरा को हमें आगे बढ़ाना चाहिए ।

जैसे गतिमान धारा को यदि शिथिल कर दिया जाए तो उसमें प्रदूषण स्वाभाविक होता है, वैसे ही यदि परंपरा में भी सकारात्मक अभिवृद्धि न हो तो विसंगतियां स्वतः आकार ग्रहण करने लगती हैं । आगे समझाते हुए मैंने कहा कि जैसे किसी रथ के पशुओं में यदि समन्वय का अभाव हो तो रथ गतिमान नहीं हो सकता वैसे ही यदि समाज के खंडों में आपस में सहयोग के स्थान पर यदि संघर्ष ही होता रहता है तो समाज भी आगे नहीं बढ़ पाता है । जो समाज आगे नहीं बढ़ पाता है उसमें समस्याएं स्वाभाविक रूप में बढ़ती जाती हैं और समाधान होता नहीं दिखता परंतु समाधान चिंता नहीं अपितु चिंतन करने से ही होता है ।

आगे अनेक ऐतिहासिक प्रसंगों को समझाते हुए मैंने अभियान के उद्देश्यों को बताना प्रारंभ कर दिया और कहा कि बिहार की भूमि प्राचीन काल से ही ज्ञान, शौर्य एवं उद्यमिता की प्रतीक रही है और यह कि हम उन्हीं यशस्वी पूर्वजों के वंशज हैं जिनमें अखंड भारत के साम्राज्य को स्थापित करने की क्षमता तब थी जब न आज की भांति विकसित मार्ग थे, न सूचना तंत्र और न उन्नत प्रौद्योगिकी ।

यह हमारे पूर्वजों के चिंतन की उत्कृष्टता ही थी जिसने बिहार को ज्ञान की उस भूमि के रूप में स्थापित किया जहाँ वेदों ने भी वेदांत रूपी उत्कर्ष को प्राप्त किया और जहाँ कालांतर में ऐसे विश्वविद्यालयों स्थापित हुए जिनमें अध्ययन हेतु संपूर्ण विश्व के विद्वान लालायित रहते थे । तब सभी को उदाहरणों के साथ समझाते हुए मैंने कहा कि उर्जा निश्चित आज भी वही है, परंतु यदि हम वांछित उन्नति नहीं कर पा रहे तो आवश्यकता केवल इस चिंतन की है कि नैसर्गिक उर्जा का प्रयोग हम कहाँ कर रहे हैं ।आवश्यकता लघुवादों यथा जातिवाद, संप्रदायवाद आदि संकीर्णताओं से परे उठकर राष्ट्रहित में आंशिक ही सही परंतु कुछ निस्वार्थ सकारात्मक सामाजिक योगदान समर्पित करने की है । मैंने सभी से चिंता नहीं अपितु चिंतन तथा आपस में संघर्ष नहीं अपितु सहयोग करने का आह्वान किया ।

यात्रा गतिमान है ! अभियान से जुड़ने के लिए इस लिंक का प्रयोग कर सकते हैं –

https://forms.gle/bchSpPksnpYEMHeL6

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